श्रावण मास में आने वाली नागपंचमी को चौरसिया दिवस के रूप में पुरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। चौरसिया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "चतुरशीतिः" से हुई हैं जिसका शाब्दिक अर्थ "चौरासी" होता हैं अर्थात चौरसिया समाज चौरासी गोत्र से मिलकर बना एक जातीय समूह है। वास्तविकता में चौरसिया, तम्बोली समाज की एक उपजाति हैं।तम्बोली शब्द की उत्पति संस्कृत शब्द "ताम्बुल" से हुई हैं जिसका अर्थ "पान" होता हैं। चौरसिया समाज के लोगो द्वारा नागदेव को अपना कुलदेव माना जाता हैं तथा चौरसिया समाज के लोगो को नागवंशी भी कहा जाता हैं।नागपंचमी के दिन चौरसिया समाज द्वारा ही नागदेव की पूजा करना प्रारम्भ किया गया था तत्पश्चात सम्पूर्ण भारत में नागपंचमी पर नागदेव की पूजा की जाने लगी। नागदेव द्वारा चूहों से नागबेल(जिस पर पान उगता हैं) कि रक्षा की जाती हैं।चूहे नागबेल को खाकर नष्ट करते हैं।इस नागबेल (पान)से ही समाज के लोगो का रोजगार मिलता हैं।पान का व्यवसाय चौरसिया समाज के लोगो का मुख्य व्यवसाय हैं।इस हेतू समाज के लोगो ने अपने आराध्यदेव और रोजगार रक्षक को श्रावण मास की पंचमी को पूजना प्रारम्भ किया गया।नागपंचमी का त्यौहार इस समाज विशेष द्वारा एक पर्व के रूप में मनाया जाता हैं।नागपंचमी के त्यौहार को पुरे भारतवर्ष के भिन्न भिन्न क्षेत्रो में भिन्न भिन्न प्रकार से बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता हैं।चौरसिया समाज के लोगो का मुख्य व्यवसाय पान की खेती करना होता हैं।भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रो में पान से सम्बंधित व्यापार व्यवसाय चौरसिया समाज के लोगो द्वारा किया जाता हैं। सम्पूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रो में चौरसिया समाज के लोगो द्वारा पान पहुँचाया जाता हैं। चौरसिया समाज मुख्यरूप से उत्तर भारत के उत्तरप्रदेश, राजस्थान,बिहार और मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ के रहवासी हैं।
चौरसिया समाज की चौरासी गोत्र में से कुछ मुख्य गोत्र: राजधीर, रसेला, भगत, चौऋषि, कश्यप, भरद्वाज, ऋषि, ब्रह्मचारी, सांडिल्य, मोदी, चौधरी, भाटिया, शर्मा, गौरहर्, बराई, तम्बोली, राई, नाग, मुंशी, बारी, राऊत, रमेला, गोरेला, कटारिया, बन्दीछोड महोबिया, मंजूरियां, धेनु, वृन्दावन का खम्ब, धानक समान,बंधरैला, झगड़ैला इत्यादि।
महाभारतकाल से समाज उत्पत्ति का इतिहास: एक मान्यता के अनुसार पांडवो द्वारा युद्ध मे कौरवो को परास्त करने के बाद सम्पूर्ण भारतवर्ष से ऋषि मुनियो को आमन्त्रित किया गया तथा एक महायज्ञ का आयोजन किया गया। यज्ञ प्रारम्भ करने के लिये पान की आवश्यकता थी लेकिन उस समय पान पृथ्वी पर मौजूद नही था।एक राजदूत को पाताल भेजा गया जहाँ पाताल लोक के राजा नाग वासुकि ने राजदूत को उंगली के ऊपरी भाग (पोर) को काटकर दिया।राजदूत द्वारा पृथ्वी पर आकर इस उँगली के भाग को बीजारोपित किया गया। जिससे एक बेल उत्पन्न हुई जिसे नागबेल कहा गया । नागबेल पर ही पान उगा।इस तरह पान पृथ्वी पर आया।इस नागबेल की रक्षा और खेती हे तू चौरसिया समाज को चुना गया।इस प्रकार चौरसिया समाज नागवंशी कहलाये तथा महाभारत काल के साक्षी कहलाये।
नागदेवता श्री चौरसिया समाज के लिये आराध्य है ।नागपंचमी को चौरसिया समाज की उत्पत्ति दिवस भी माना जाता है । कई पंचाग व कैलेंडर भी इस दिन को चौरसिया दिवस के रूप में लिखते है । आप सभी इस दिन को उत्साह से बनाये।